कमरे के भीतर पसरा सन्नाटा बाहर की दुनिया की खामोशी से बिल्कुल अलग था। यह एक ऐसा सन्नाटा था जो आने वाले तूफान की गवाही दे रहा था। विवान का शर्टलेस बदन, अहाना के नाजुक शरीर को पूरी तरह से अपने साए में ले चुका था। दोपहर की सुनहरी धूप खिड़की के पर्दों से छनकर उन दोनों पर पड़ रही थी। अहाना ने अपनी आँखें बंद कर ली थीं, उसकी पलकों पर गिल्ट के आंसू अब भी थमे हुए थे, लेकिन उसके भीतर की तड़प अब किसी भी बंदिश को मानने के लिए तैयार नहीं थी।
"अहाना... अपनी आँखें खोलो," विवान की भारी और गहरी आवाज़ उसके कानों के पास गूँजी। उनकी गर्म सांसें अहाना के गालों को झुलसा रही थीं।







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