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भाग 3: पहली नोक-झोंक

किचन में विवान के हाथ में पानी की बोतल थमाए और उसकी उस कातिलाना, धीमी फुसफुसाहट को अपने कानों में समेटे अहाना वहां एक पल भी और नहीं रुक सकी। उसके नंगे पैर संगमरमर के फर्श को छूते हुए इतनी तेजी से भागे कि सैटिन नाइटगाउन का घेरा उसकी गोरी जांघों से बुरी तरह रगड़ खा रहा था। वह अपने कमरे में आई, दरवाजा बंद किया और बेड पर गिर पड़ी। पूरी रात उसने करवटें बदलते हुए बिताई। उसकी बंद आँखों के सामने बार-बार विवान की वो चौड़ी गठीली छाती, उसके पेट के एब्स और उसकी नाभि के नीचे जाता हुआ लोअर घूम रहा था।

जब सुबह की सुनहरी धूप खिड़की के पर्दों को चीरती हुई अहाना के चेहरे पर पड़ी, तो उसकी आँखें खुलीं। उसके सिर में एक हल्का सा दर्द था, जो रात भर जागने और विवान की आवाज़ की लत के कारण पैदा हुआ था। उसने बेड पर उठकर बैठते हुए अपनी हथेलियों से अपने चेहरे को रगड़ा। उसकी सुराहीदार गर्दन और हंसली पर सुबह की ठंडी हवा छू रही थी।

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