अगले दिन दोपहर ढलते ही आसमान का मिजाज पूरी तरह बदल गया। काले, घने बादलों ने पूरे शहर को अपनी आगोश में ले लिया था। ठंडी हवा के झोंके खिड़की के शीशों से टकराकर एक साए की तरह गूंज रहे थे। रिया अपने कमरे में खड़ी होकर खिड़की के पार देख रही थी। उसके भीतर कल रात की वो तड़प और वासना की आग अभी भी सुलग रही थी। उसकी उंगलियां रह-रहकर उसकी शॉर्ट्स के ऊपर से उसकी योनि के उस उभरे हुए हिस्से को सहला रही थीं, जो विक्रम की याद मात्र से ही एक मीठे रस से भीग जाता था।





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