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दीवारों के पार की सिसकियाँ

अंधेरे कमरे की मखमली नीरवता में आरव के होंठ प्रीति की गर्दन के सबसे संवेदनशील हिस्से पर थमे हुए थे। उसकी गरम हथेलियों का भारी दबाव प्रीति की छाती के ठीक नीचे एक सुलगती हुई लकीर खींच रहा था। प्रीति का पूरा बदन आरव के नीचे बेबस और बेहाल था। उसकी रीढ़ की हड्डी में उठने वाली सिहरन इतनी तीव्र थी कि उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर ली थीं।

"आरव... मुझे... प्लीज..." काव्या के होंठों से निकली यह अधूरी गुहार हवा में ही घुलकर रह गई।

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