आसमान में काले घने बादलों का डेरा था। शाम के छह बज रहे थे, लेकिन अंधेरा ऐसा था मानो आधी रात हो चुकी हो। दिल्ली की सड़कों पर मूसलाधार बारिश हो रही थी, जिससे खिड़की के कांच पर पानी की बूंदें लगातार टकरा रही थीं।
सिया अपने बुटीक 'द एलीगेंस' के काउंटर पर बैठी कुछ स्केच ठीक कर रही थी। उसकी उंगलियाँ पेंसिल पर थमी थीं, लेकिन ध्यान कहीं और ही था। पिछले कुछ दिनों से उसे लगातार ऐसा लग रहा था कि कोई उस पर नजर रख रहा है। कोई बहुत करीब से उसकी हर एक हरकत को नोट कर रहा है।
उसकी असिस्टेंट टीना ने अपना बैग उठाते हुए कहा, "मैम, बाहर बहुत तेज बारिश हो रही है। अगर आप कहें तो मैं अब निकलूूं? कैब मिलने में बहुत दिक्कत हो रही है।"
सिया ने अपनी बड़ी-बड़ी खूबसूरत आंखों को स्केच से हटाकर टीना की तरफ देखा और एक हल्की मुस्कान के साथ कहा, "हाँ टीना, तुम निकलो। वैसे भी आज क्लाइंट्स नहीं आने वाले। बाकी का काम मैं खुद संभाल लूंगी।"
"थैंक यू सो मच मैम! आप अपना ख्याल रखिएगा। आजकल मौसम बहुत खराब चल रहा है," टीना ने मुस्कुराते हुए कहा और बुटीक का दरवाजा खोलकर बाहर निकल गई। दरवाजे पर लगी छोटी सी घंटी की आवाज गूंजी 'टिनटिन' और फिर चारों तरफ सन्नाटा पसर गया।
सिया ने गहरी सांस ली और अपने उलझे बालों को उंगलियों से पीछे किया। उसने बुटीक की मुख्य लाइटें बंद कर दीं, जिससे वहां केवल एक हल्की पीली (वॉर्म) रोशनी रह गई। जैसे ही वह काउंटर के पीछे रखी अपनी अलमारी से बैग निकालने के लिए मुड़ी, बुटीक के बड़े से कांच के दरवाजे के पार, सड़क की दूसरी तरफ खड़ी एक ब्लैक एसयूवी (SUV) पर उसकी नजर पड़ी।
गाड़ी के सारे शीशे पूरी तरह ब्लैक थे। हेडलाइट्स बंद थीं, लेकिन गाड़ी स्टार्ट थी क्योंकि उसके साइलेंसर से हल्का धुआं निकल रहा था। सिया का दिल अचानक तेजी से धड़कने लगा। यह वही गाड़ी थी जो उसने पिछले तीन दिनों से अपने घर के बाहर और ऑफिस के आसपास देखी थी।
उसने खुद को दिलासा देते हुए कहा, "नहीं सिया, तुम बस ज्यादा सोच रही हो। दिल्ली है, कोई भी कहीं भी गाड़ी पार्क कर सकता है।"
लेकिन जैसे ही उसने अपनी नजरें हटाने की कोशिश की, गाड़ी का शीशा धीरे-धीरे नीचे सरका। पूरी तरह नहीं, बस इतना कि अंदर बैठे इंसान की मजबूत, चौड़ी रूपरेखा दिखाई दे सके। सिया की सांसें थम गईं। वहां कोई बैठा था, जो अपनी सुलगती हुई गहरी नजरों से सीधे बुटीक के अंदर, सिया को ही देख रहा था। अंधेरा इतना था कि चेहरा साफ नहीं दिख रहा था, लेकिन उन नजरों की तपिश सिया अपने बदन पर महसूस कर सकती थी।
सिया ने घबराकर अपने हाथ में पकड़ी पेंसिल नीचे गिरा दी। उसकी रीढ़ की हड्डी में एक ठंडी सिहरन दौड़ गई। वह तुरंत काउंटर के पीछे थोड़ा छिप गई और अपनी धड़कनों को काबू करने की कोशिश करने लगी।
"कौन है वह? वह मुझे इस तरह क्यों देख रहा है?" उसने अपने कांपते हुए होंठों से बुदबुदाया।
उसने हिम्मत जुटाई और दोबारा कांच के दरवाजे की तरफ देखा। इस बार, वह गाड़ी वहां नहीं थी। वह इतनी खामोशी से गायब हो चुकी थी मानो कभी वहां थी ही नहीं। सड़क पर सिर्फ तेज बारिश का पानी बह रहा था और स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी पानी में तैर रही थी।
सिया ने चैन की सांस ली, "शुक है... वह चला गया।"
उसने जल्दी-जल्दी अपना फोन उठाया, बुटीक को लॉक किया और बाहर आई। बारिश की ठंडी बूंदें उसके चेहरे पर गिरीं, जिससे उसकी घबराहट थोड़ी कम हुई। उसने अपनी छाते को खोला और कैब बुक करने के लिए फोन स्क्रीन पर उंगलियां चलाने लगी। लेकिन नेटवर्क पूरी तरह गायब था। बारिश की वजह से सिग्नल जाम हो चुके थे।
"शिट! इस वक्त नेटवर्क को भी जाना था!" वह झुंझला उठी।
उसे अब पैदल ही मेन रोड तक जाना था, जो बुटीक वाली गली से लगभग पांच मिनट की दूरी पर था। वह गली थोड़ी सुनसान थी, और इस वक्त बारिश की वजह से वहां कोई नहीं था। सिया ने अपने बैग को कसकर पकड़ा और तेज कदमों से चलना शुरू किया। उसके सैंडल की आवाज उस खामोश गली में गूंज रही थी, टक... टक... टक...
तभी उसे अपने पीछे किसी और के कदमों की आवाज सुनाई दी।
टक... टक...
वह रुकी। कदमों की आवाज भी रुक गई।
उसका दिल उसके हलक में आ गया। उसने पीछे मुड़कर देखा, लेकिन वहां सिर्फ अंधेरा और बारिश की बौछारें थीं। कोई नहीं था। उसने अपनी रफ्तार बढ़ा दी। अब वह लगभग भाग रही थी। जैसे ही वह गली के मोड़ पर पहुंची, पीछे से फिर वही भारी और सधे हुए कदमों की आवाज आई। इस बार वह आवाज बहुत करीब थी। ऐसा लगा जैसे कोई ठीक उसके पीछे खड़ा है और उसकी गर्म सांसें सिया की गर्दन के पिछले हिस्से को छू रही हैं।
सिया डर के मारे चीखने ही वाली थी कि वह दौड़कर मेन रोड पर आ गई। सामने ही एक खाली ऑटो आ रहा था। उसने बिना सोचे-समझे हाथ हिलाया, "भैया! रोकिए!"
ऑटो रुका और सिया तुरंत अंदर बैठ गई। उसने अपने भीगे हुए चेहरे को पोंछा और पीछे मुड़कर देखा। उस सुनसान गली के मुहाने पर, एक लंबा, भारी डील-डौल वाला साया खड़ा था। उसने ब्लैक ओवरकोट पहना हुआ था और उसका चेहरा एक ब्लैक कैप और मफलर के पीछे छिपा था। वह बस स्थिर खड़ा होकर सिया को जाते हुए देख रहा था।
"मैम, कहाँ जाना है?" ऑटो वाले की आवाज से सिया वर्तमान में लौटी।
सिया ने हांफते हुए अपना address कहा।
पूरे रास्ते सिया का दिमाग उसी साए के इर्द-गिर्द घूमता रहा। वह कोई आम चोर या मजनू नहीं लग रहा था। उसकी खड़े रहने की शैली में एक अजीब सा रौब, एक खतरनाक अधिकार था।
लगभग बीस मिनट बाद ऑटो उसके अपार्टमेंट के सामने रुका। सिया ने पैसे दिए और दौड़कर बिल्डिंग के अंदर चली गई। लिफ्ट का बटन दबाते समय उसके हाथ कांप रहे थे। ग्राउंड फ्लोर पर लिफ्ट आई, दरवाजा खुला और वह अंदर घुस गई। जैसे ही वह 5वें फ्लोर का बटन दबाने वाली थी, एक भारी और मजबूत हाथ ने लिफ्ट के दरवाजे को बंद होने से रोक दिया।
सिया का दिल एक पल के लिए रुक गया।
दरवाजा दोबारा खुला और एक आदमी अंदर आया। उसने एक महंगा सूट पहना हुआ था, लेकिन उसका चेहरा नीचे की तरफ झुका हुआ था क्योंकि वह अपने फोन पर कुछ टाइप कर रहा था। उसकी कलाई पर बंधी रोलेक्स घड़ी और उसकी महंगी परफ्यूम की तेज, मर्दाना खुशबू ने तुरंत लिफ्ट के छोटे से केबिन को भर दिया। वह खुशबू इतनी सम्मोहक थी कि सिया का डर एक पल के लिए कहीं खो गया।
उस आदमी ने सिया की तरफ देखे बिना ही एक बेहद गहरी, भारी और मखमली आवाज में कहा, "कौन सा फ्लोर?"
उसकी आवाज सुनकर सिया के बदन में करंट सा दौड़ गया। वह इतनी गहरी और रसीली आवाज थी कि कोई भी औरत अपना होश खो बैठे।
"फि... फिफ्थ फ्लोर," सिया ने हकबकाते हुए कहा।
उसने बिना कुछ बोले बटन दबा दिया। लिफ्ट ऊपर जाने लगी। लिफ्ट की स्टील की दीवार पर उस आदमी का अक्स दिख रहा था। वह लंबा था, कम से कम छह फीट दो इंच। उसकी चौड़ी छाती और मजबूत कंधे उसके सूट के अंदर से भी साफ झलक रहे थे। सिया को महसूस हुआ कि वह आदमी भले ही फोन देख रहा था, लेकिन उसकी छिपी हुई नजरें लिफ्ट के शीशे के जरिए सीधे सिया के चेहरे और उसकी भीगी हुई कुर्ती पर टिकी थीं, जो उसके बदन से चिपक गई थी।
टिंग! लिफ्ट पांचवें फ्लोर पर रुकी। सिया बिना उस आदमी की तरफ दोबारा देखे तुरंत बाहर निकल गई। उसने अपने फ्लैट नंबर 502 का दरवाजा खोला, अंदर गई और तुरंत दरवाजा बंद करके कुंडी चढ़ा दी। उसने अपनी पीठ दरवाजे से टिका दी और अपनी बंद आंखों से गहरी सांसें लेने लगी।
"तुम पागल हो रही हो सिया। वह बस तुम्हारी ही बिल्डिंग का कोई रेसिडेंट या किसी का मेहमान होगा। शांत हो जाओ," उसने खुद को समझाया।
उसने अपने भीगे कपड़े बदले और एक ढीली-ढाली टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहन लिए। अपनी बालकनी का दरवाजा बंद करने के लिए जैसे ही वह आगे बढ़ी, उसकी नजर लिविंग रूम के सेंटर टेबल पर पड़ी। वहां कांच के एक खूबसूरत वास (Vase) में लाल गुलाब का एक सिंगल बुके रखा हुआ था।
सिया के कदम वहीं जम गए।
"यह... यह यहाँ कैसे आया? मैं तो सुबह कोई फूल नहीं लाई थी," उसका दिमाग सन्न रह गया।
वह धीरे-धीरे टेबल के पास पहुंची। गुलाब एकदम ताजे थे, और उन पर पानी की कुछ बूंदें अभी भी चमक रही थीं। इसका मतलब वे अभी कुछ ही देर पहले वहां रखे गए थे। उन गुलाबों के बीच कोई नोट या खत नहीं था, जैसा कि आम तौर पर होता है। लेकिन उन फूलों की खुशबू पूरे कमरे में फैली हुई थी।
अचानक सिया को याद आया। यह वही खुशबू थी... नहीं, यह फूलों की नहीं, बल्कि उस महंगे परफ्यूम की खुशबू थी जो उसने अभी कुछ देर पहले लिफ्ट में उस अजनबी के बदन से महसूस की थी।
उसका पूरा बदन डर से कांपने लगा। "क्या वह... क्या वह मेरे घर के अंदर आया था? लेकिन कैसे? चाबी तो सिर्फ मेरे पास है!"
उसने तुरंत अपने पूरे घर का चक्कर लगाया। बेडरूम, किचन, बाथरूम... सब कुछ सामान्य था। कहीं कोई तोड़-फोड़ नहीं थी, कोई सामान गायब नहीं था। लेकिन उस घर की हवा में एक अजीब सा अहसास था, जैसे कोई अभी-अभी उसकी बेड पर बैठकर गया हो। जब वह अपने बेडरूम के आईने के सामने खड़ी हुई, तो उसे कांच पर उंगलियों से बना एक हल्का सा निशान दिखा, मानो किसी ने उसके अक्स को वहां छुआ हो।
तभी उसके फोन की रिंगटोन बजी, जिससे वह डरकर उछल पड़ी। स्क्रीन पर 'माँ' का नाम चमक रहा था। सिया ने कांपते हाथों से कॉल रिसीव किया।
"हैलो, माँ?" सिया की आवाज में डर साफ था।
"सिया! कितनी बार कहा है कि फोन जल्दी उठाया कर। और तेरी आवाज को क्या हुआ? हांफ क्यों रही है?" उसकी मां, रेणुका की तीखी आवाज फोन के स्पीकर से गूंजी।
"कुछ नहीं माँ, बस सीढ़ियां चढ़कर आई हूं। लिफ्ट खराब थी," सिया ने झूठ बोला, क्योंकि वह अपनी माँ को डराना नहीं चाहती थी।
"अच्छा सुन, फालतू के बहानों में वक्त मत बर्बाद कर। मैं और तेरे पापा अगले हफ्ते दिल्ली आ रहे हैं। और हां, इस बार हम खाली हाथ नहीं आ रहे। कपूर साहब के बेटे का रिश्ता आया है। बहुत बड़ा बिजनेस है उनका। इस बार तुझे हां कहना ही होगा। यह बुटीक-वुटीक का काम बंद कर और घर बसाने की सोच," रेणुका ने बिना रुके अपना आदेश सुना दिया।
सिया ने अपनी आंखें मूंद लीं और थके हुए स्वर में कहा, "माँ, प्लीज। मैंने आपसे कितनी बार कहा है कि मुझे अभी शादी नहीं करनी है। मैं अपने पैर पर खड़ी हो रही हूं, मेरा बुटीक अच्छा चल रहा है।"
"क्या खाक अच्छा चल रहा है? अकेली लड़की उस बड़े शहर में रहती है, हमें यहाँ रात को नींद नहीं आती। जब तक तेरे हाथ पीले नहीं हो जाते, मेरे कलेजे को ठंडक नहीं मिलेगी। लड़का बहुत अमीर है, तुझे रानी बनाकर रखेगा। बस, मैंने कह दिया सो कह दिया। अगले हफ्ते बात होगी," मां ने बिना सिया का जवाब सुने फोन काट दिया।
सिया ने फोन को सोफे पर फेंक दिया और अपना सिर पकड़कर बैठ गई। एक तरफ वह अनजाना स्टॉकर, जो उसके घर तक पहुंच चुका था, और दूसरी तरफ परिवार का यह शादी का दबाव। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह किससे लड़े।





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