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राठौड़ मेंशन जाना

मेहमानों के जाने के बाद घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया था। हलवाई और टेंट वाले अपना काम समेट रहे थे। आनंद जी और सावित्री जी सोफे पर बैठकर राहत की सांस ले रहे थे।

"भगवान का लाख-लाख शुक्र है, सब कुछ बहुत अच्छे से निपट गया," सावित्री जी ने अपने हाथ जोड़कर ऊपर आसमान की तरफ देखा। "लड़के के पिता तो बहुत ही भले इंसान हैं। और अथर्व... थोड़ा कड़क जरूर है, लेकिन अपनी जिम्मेदारी को समझता है। देखा कैसे उसने तुरंत शादी की तारीख पर हामी भर दी?"

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