
सुबह के ठीक 4:30 बजे थे। दक्षिण दिल्ली के सबसे आलीशान फार्महाउस 'शेखावत मैंशन' में सन्नाटा पसरा था, जिसे केवल पक्षियों की चहचहाहट तोड़ रही थी। रुद्र सिंह शेखावत की आँखें अलार्म बजने से ठीक एक मिनट पहले खुल गईं। यह उसका अनुशासन था। वह बिस्तर से उठा, सिल्क की चादरें एक तरफ कीं और खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। बाहर धुंध थी, बिल्कुल वैसी ही धुंध जैसी उसके जीवन में थी साफ दिखने वाली पर गहराई में रहस्यमयी। उसने अपनी कलाई की नसों को देखा, जहाँ गुस्सा और नियंत्रण दोनों एक साथ बहते थे। आज एक बड़ी बोर्ड मीटिंग थी, और रुद्र के लिए हारना उसके dictionary में नहीं था।
जिम के अंदर भारी लोहे के टकराने की आवाज़ गूंज रही थी। रुद्र 100 किलो का बेंच प्रेस कर रहा था। उसकी मांसपेशियों में तनाव साफ दिख रहा था, माथे से पसीना टपक कर फर्श पर गिर रहा था। उसके ट्रेनर ने टोकना चाहा, "सर, आज आप ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर लगा रहे हैं।"
रुद्र ने रॉड को स्टैंड पर पटका और उठकर बैठ गया। उसने तौलिये से अपना चेहरा पोंछा और अपनी ठंडी नज़रों से ट्रेनर को देखा। "जब तक दर्द महसूस न हो, तब तक जीत का अहसास नहीं होता। और मुझे आज जीतना है।" उसकी आवाज़ में वह अधिकार था जो किसी के भी तर्क को खत्म कर देता था।
नहाने के बाद, रुद्र अपने विशाल 'वॉक-इन क्लोजेट' में खड़ा था। उसने एक कड़क सफेद कमीज निकाली। जैसे ही उसने बटन बंद किए, उसकी नज़र ड्रेसर पर रखी एक पुरानी धुंधली तस्वीर पर पड़ी सिया के पिता (उसके दोस्त) और वह, दोनों साथ हंस रहे थे। रुद्र की उंगलियां एक पल के लिए ठिठकीं। वह दोस्त, जिसका साथ छूट गया था। लेकिन अगले ही पल उसने अपना चेहरा सख्त कर लिया। "तुमने जो अमानत छोड़ी है, उसकी सुरक्षा करना मेरा काम है, भावनाएं नहीं," उसने खुद से बुदबुदाया और अपनी महंगी घड़ी पहन ली।
डायनिंग टेबल पर रुद्र अकेला बैठा था। उसके सामने उसके पर्सनल असिस्टेंट, खन्ना जी खड़े थे, जो उसे आज के शेड्यूल के बारे में बता रहे थे।
"सर, शेखावत ग्रुप के साथ आज फाइनल साइनिंग है। और... एक और बात। वह लड़की, सिया... उसने इंटरनशिप के लिए आवेदन किया है।"
रुद्र का हाथ कॉफी के कप पर रुक गया। उसने सिर उठाकर खन्ना की ओर देखा। "उसे रिजेक्ट कर दो।"
"पर सर, वह टॉप पर है और नियम के हिसाब से.."
रुद्र ने कप मेज पर ज़ोर से रखा। "नियम मैं बनाता हूँ, खन्ना। वह अभी बच्ची है। उसे दुनिया की गंदगी से दूर रखो। उसे बोलो हॉस्टल में रहे और अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे।"
रुद्र की काली 'मेबैक' शेखावत ग्रुप के मुख्यालय के सामने आकर रुकी। दो गार्ड्स ने तुरंत दरवाज़ा खोला और सिर झुका लिया। जैसे ही रुद्र के पॉलिश किए हुए जूतों ने फर्श को छुआ, रिसेप्शन पर खड़ी लड़कियों ने अपनी सांसें रोक लीं। वह सीधे लिफ्ट की ओर बढ़ा। कोई 'गुड मॉर्निंग' नहीं, कोई मुस्कुराहट नहीं। बस उसकी मौजूदगी ही काफी थी लोगों को यह बताने के लिए कि 'मालिक' आ चुका है।
30वीं मंजिल पर उसका केबिन किसी महल से कम नहीं था। पूरी दीवार कांच की थी जहाँ से आधा शहर दिखाई देता था। रुद्र अपनी बड़ी सी लेदर चेयर पर बैठा। उसने फाइलों का ढेर देखा। उसके चेहरे पर एक अजीब सा घमंड था। यह घमंड उस पद का नहीं था, बल्कि उस अकेलेपन का था जिसे उसने खुद चुना था। वह फोन उठाकर किसी को डांटने ही वाला था कि तभी उसे खन्ना का मैसेज मिला "सर, सिया मेहरा ऑफिस में पहुँच चुकी है।" रुद्र के माथे पर बल पड़ गए।
रुद्र अपने केबिन से बाहर निकला ताकि वह कॉन्फरेंस रूम जा सके। रास्ते में कर्मचारी दीवार से चिपक कर खड़े हो गए। तभी मोड़ पर एक लड़की तेज़ी से भागती हुई आई और सीधे रुद्र से टकरा गई। उसके हाथ में मौजूद फाइलें बिखर गईं। वह सिया थी।
"ओह माय गॉड! आई एम सो सॉरी!" उसने बिना देखे कहा और घुटनों के बल बैठकर फाइलें उठाने लगी।
रुद्र खड़ा रहा, जैसे कोई पत्थर की मूर्ति हो। उसने नीचे नहीं देखा, बस उसकी नज़रों में तिरस्कार था। "सीख लो, यह ऑफिस है, टहलने के लिए कोई पार्क नहीं।"
सिया ने सिर उठाया। उसकी आँखों में कोई डर नहीं था, बल्कि एक चमक थी। "रुद्र... मेरा मतलब है, मिस्टर शेखावत? आप?"
रुद्र ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। उसकी जींस और ढीली शर्ट उसे एक बच्ची जैसा दिखा रही थी। "तुम यहाँ क्या कर रही हो? मैंने मना किया था।"
सिया खड़ी हुई और अपनी धूल झाड़ी। "मैं अपनी काबिलियत पर आई हूँ। और आप 'तुम' क्यों बोल रहे हैं? मैं बड़ी हो गई हूँ।"
रुद्र उसके और करीब आया, इतना करीब कि उसकी परछाई ने सिया को पूरी तरह ढक लिया। "मेरे लिए तुम हमेशा वही रहोगी जिसे मैंने रोते हुए देखा था। यहाँ से चली जाओ, इससे पहले कि मैं तुम्हें धक्के मारकर बाहर निकलवाऊं।"
सिया का मुँह बन गया।
रुद्र बोर्डरूम के अंदर गया, लेकिन उसका दिमाग सिया के उन शब्दों पर अटका था "मैं बड़ी हो गई हूँ।" उसने मीटिंग शुरू की। इंवेस्टर उससे सवाल पूछ रहे थे, लेकिन रुद्र के जवाब इतने सटीक और कड़वे थे कि किसी की हिम्मत नहीं हुई दोबारा बोलने की। "मुझे profit चाहिए, ethics नहीं। अगर आप invest कर रहे हैं, तो मेरे तरीके से चलें, वर्ना दरवाज़ा खुला है।" यह उसका घमंड था, उसकी ताकत थी।
मीटिंग खत्म होने के बाद रुद्र अपने केबिन में वापस आया। सूरज ढल रहा था। उसने खिड़की से बाहर देखा। नीचे पार्किंग में उसने सिया को देखा, जो शायद अपनी कैब का इंतज़ार कर रही थी। वह थकी हुई लग रही थी लेकिन उसके चेहरे पर हार नहीं थी।
रुद्र ने खिड़की के शीशे पर अपनी मुट्ठी कसी। "जितना तुम मेरे करीब आओगी सिया, उतना ही मैं तुम्हें दूर धकेलूँगा। तुम मेरी दुनिया का हिस्सा कभी नहीं बन सकती।"
उसने अपना फोन उठाया और खन्ना को कॉल किया। "खन्ना, सिया को इंटरनशिप दे दो। लेकिन उसे सबसे मुश्किल काम देना। मैं चाहता हूँ कि वह खुद हार मानकर यहाँ से भाग जाए।"





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